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An unsolved thought
thought 24-Oct-2019

An unsolved thought

दिवाली और भिखारी

दीवाली के दिन आप जाने कितने रुपयों के पटाखे फोड़ देंगे। एक रात में ही इतना ज्यादा खाद्य तेल बस यूं ही बर्बाद कर देंगे। जरा सोचिए, इन पैसों से कितने गरीबों के लिए आटा, चावल आ जायेगा, इस तेल से पूड़ियाँ तल कर वे भी त्योहार मना पाएंगे।
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कुछ दिन पहले जब अपनी बेटी के जन्मदिन पर उसके लिए कपड़े लेने और केक ऑर्डर करने शहर गया तो गाड़ी से उतरने से पहले ही एक करीब तीस-बत्तीस साल की भिखारन सामने पड़ गई। इन भिखारियों की बड़ी गन्दी आदत होती है, आप कार बैक कर रहे हों, साइड लगा रहे हों पर ये तब तक आपका पीछा नहीं छोड़ते, जब तक आप इन्हें झिड़क न दें या कुछ पैसे न दे दें।

ये भी कुछ वैसी ही चिपकू भिखारन थी। हाथ फैलाये, जिसपर 3-4 रुपये के चिल्लर रखे हुए थे, उन्हें मुंह तक ले जाती और कुछ उलझे शब्दों में बच्चा, भूख, खाना जैसा कुछ बोले जा रही थी। बच्चा सुना तो ध्यान आया कि उसके कंधे पर कोई एक-डेढ़ साल का बच्चा लटका हुआ है। औरत के शरीर पर चिपटे मटमैले चीथड़ों की तरह एक चीथड़ा। बच्चे और कपड़ों का रंग इतना एकसार था कि पहली नजर में बच्चा दिखा ही नहीं। देखा उसका एक हाथ निर्जीव सा, शरीर में कोई स्पंदन नहीं।

12 बजे दिन का समय, क्या तब तक उन माँ-बच्चे ने कुछ खाया नहीं होगा? क्या इतनी देर में बस यही 3-4 रुपये ही मिले होंगे इसे? ये भिखारी भी बहुत बेवकूफ बनाते हैं! तर्क उन्हें झिड़कने के लिए उकसा रहा था पर दिल ने कहा कि क्या हुआ अगर बेवकूफ बन ही गए तो। रोज ही इतना तो खर्च करते ही हो, ये भी सही। जेब में हाथ डाला तो बड़े नोट थे, मित्र से 20 रुपये लेकर दे दिए। मन में था कि ये भिखारन भी ठग ही रही है। पर मुझे बुरी तरह से लज्जित करती हुई वो सामने के राजमा-चावल के ठेले की तरफ दौड़ गई। कितनी भूखी थी ! नजर फेरकर मैं आगे बढ़ा पर जब मैंने हजारों का केक और कपड़े लिए, पार्टी में कई हजार फूंक दिए तो मुझे वो औरत-बच्चा याद आते रहे। हर बार दिल कहे जा रहा था कि इतने में तो जाने कितने भूखों का पेट भर जाता रे, तू तो बर्बाद कर रहा है ये सब।
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आज सुबह जब ये मैसेज आया कि पटाखे के पैसे और तेल गरीबों को दे दो तो ख्याल आया कि ये सोच भले ही कितनी पवित्र हो पर क्या यह सही भी है? वो भिखारन अगर भिखारी न होती तो क्या करती? कहीं दिए, मोमबत्ती, पटाखे, लड़ियाँ, बातियां, मिट्टी की मूर्तियां, लावा-खील बनाती, बेच रही होती। अगर हम ये चीजें न खरीदें और उसके पैसे गरीबों में बांट दें तो जो लोग इन चीजों को बनाते हैं, उनका क्या होगा? क्या वे भिखारी नहीं हो जाएंगे?

कोई भी एक चीज लीजिये, मसलन 'दिया', और सोचिये कि इसे आपके घर में जलाने तक की अंतिम परिणीति तक इससे कितने लोगों का रोजगार जुड़ा है। नदी से मिट्टी खोदने वाले मजदूर से लेकर, दिया बनाने वाला कुम्हार, उसे खरीदने-बेचने वाले बहुत ही छोटे व्यापारी, सरसो के तेल के लिए सरसो उपजाने वाले किसान से लेकर तेल निकालने वाले तेली तक।

गरीबों के प्रति दया दैवीय गुण है। यथासम्भव मदद करनी ही चाहिए पर यह भी देखिए कि इस एकपक्षीय सोच से आप कुछ की मदद करने के लिए जब सम्पूर्ण पर निषेध ओढ़ लेते हैं तो कहीं ऐसा तो नहीं कि जिनकी मदद करने के लिए आप ऐसा करते हैं, उन्हीं की संख्या में वृद्धि का कारण बन रहे हैं!

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आप जिसे लक्जरी समझ रहे हैं वो बहुतों का पेट भरता है! उन्हें भिखारी बनने से रोकता है! तो ऐसे मैसेजेज को अवॉयड कीजिए। त्योहार है, जश्न मनाइए, और मानकर चलिए कि आप ऐसा करके भी पुण्य ही कर रहे हैं।

[[एक वैचारिक साझेदारी ]]

Shrikant Mishra
Shrikant Mishra
Content Writer

I'm a professional writer and Business Development with more than 10 years of experience. I have worked for a lot of businesses and can share sample works with you upon request. Chat me up and let's get started.

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