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title: "Maut Ki Manzoori"  
description: "This story is about an Islamic man who does everything for his community but in the end had to kill his family to protect the house's respect."  
author: "Harsh Pandey"  
published: 2019-12-12  
canonical: https://yourviews.mindstick.com/view/70570/maut-ki-manzoori  
category: "story"  
tags: ["death", "sad story", "story", "ficton", "helplessness"]  
reading_time: 4 minutes  

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# Maut Ki Manzoori

#### मौत की मंज़ूरी

मौत की मंज़ूरी एक ऐसी दास्तान है जिसे लिखते हुए भी शायद किसी सभ्य आदमी की रूह कांप जाए. बात साल 1983 की है. हैदराबाद की बाबा अफ़ग़ान गली में जनाब शमशेरुद्दीन शाह के यहाँ बेटी रेवा की निकाह की दावत थी.

सभी लोग तो दावत उड़ाने के लुत्फ़ में मशरूफ थे लेकिन शमशेरुद्दीन साहब का कुछ अता-पता ही नहीं चल रहा था. छोटी बेटी सकीना छत तक होकर आई तो वहां उसे अब्बा जान एकांत में मिले. शायद वह कुछ सोच रहे होंगे यही समझते हुए सकीना नीचे वापस जाने लगी लेकिन तभी उसके पिता ने उसे पीछे से आवाज़ दी - "बिटिया ज़रा इधर तो आना ताकि हम सब इस रात की आखिरयत में चैन से मिल सके." 18 साल की सकीना यूँ तो चंचल स्वाभाव की थी लेकिन अब्बाजान की धीमी किन्तु गंभीर आवाज़ को सुनकर वह भी एकदम से हिल गई और आखिर में किसी तरह दम कर के उसने पूछ ही लिया "अब्बा जी, आखिर हुआ क्या ? आप इतने खफ़ा क्यों लग रहे हो?" \

शमशेरुद्दीन ने अपनी बिटिया का माथा चूमते हुए झूठे दिलासे में कहा कि ऐसी कोई बात नहीं डरने की बस आज एक ख़ास पल है, एक ख़ास रात है कि तभी तो यहाँ छत पर इतनी सजावट की हुई है.

**"आप नाराज़ तो नहीं है न अब्बू ?" सकीना ने भरी मासूमियत से पूछा. "नहीं बिटिया, आप तो हमारी जान है, आप से कैसे नाराज़ हो सकते है ?"** एक ख़ास तोहफे देने है आप लोगों को इसलिए जल्दी जाइये और अपनी बड़ी रेवा को बुला लाइए, अम्मा जी कमरे में सो रही होंगी उनको मत बुलाना क्यूंकि अब वह आराम ही करेंगी.

तोहफे की चाहत में सकीना अपने बाप के रौंधे होते गले और बहती हुई आंसुओं की धारा को नहीं देखा. वह जाकर अपनी बड़ी बहिन रेवा जो कि मेहमानों से घिरी हुई थी, उनसे बातें कर रही थी.

रेवा के कान में जाकर सकीना फुसफुसाती है कि अब्बाजान ने ऊपर को बुलाया हुआ है अब तनिक टाइम निकाल चलो नाको मुझे नहीं मिलेगा न कोई तोहफा, सबको जो मिलना है!

रेवा भी मानो बचपने में आ गई और सकीना के साथ ऊपर छत को चल दी बिना साजिद अपने मंझले भाई को बताए और अंत में दोनों अब्बा जान तक पहुँच ही गई थी.

साजिद कहाँ था ? फार्महाउस पर अपनी हमेशा के लिए सो चुकी वालिदा की लाश देखकर वह स्तब्ध हो चुका था, उसने कागज़ पर लिखा देखा कि सकीना और रेवा को ऊपर बुलाना है ..........

वह मेन घर की तरफ दौड़ पड़ा ....गलियारे देखा और मेहमानों की रंगीनी से भरी हाल की महफ़िल से खुद को भागते हुए वह कमरे तलाशने लगा फिर जब थक गया तो छत पर से आवाज़ आती सुनी.

वह छत को भागने लगा, सामने का मंज़र किसी कशमश की शुरुआत को इंगित कर रहा था. उसने देखा कि उसके अब्बाजान शमशेरुद्दीन अपनी बेटियों के सिर पर चूमते हुए कुछ कहते है फिर वह साजिद को देख के सावधान होने लगते है और तीनो बच्चो से कहते है- "हमें आप सबसे से एक बात की मंज़ूरी चाहिए, बोलिये देंगे?"

"जी अब्बू आप बस कहिये तो सही ....." तीनो बच्चो ने कहा ........साजिद कुछ समझता उससे पहले ही .....शमशेरुद्दीन ने अपनी रिवॉल्वर निकालते हुए तीनो पर तान दी और कहा कि "हमें मौत की मंज़ूरी मिल गई"

दोनों बेटियों पर धड़ाधड़ फायरिंग और फिर खुद के गले पर नल्ली रखते हुए बेटे साजिद से बोले कि "बेटा साजिद ! कुछ ही देर में पुलिस आने वाली है, कौम के लिए इतना किया लेकिन आज कोई सहारा नहीं है इसलिए अपनी इज़्ज़त को खुद ही मिटा दिया हमने ....तुमको नहीं ले जा रहे अल्लाह के घर क्योंकि तुमको सबको मिट्टी करनी होगी....खुदा हाफ़िज़ !"

साजिद जोर से चिल्लाते हुए शमशेर को रोकने के लिए बढ़ा लेकिन तब तक उनका शरीर ज़मीन पर .....पुलिस आधे घंटे में घर की तलाशी शुरू कर चुकी थी ....मेहमानों में परेशानी और हैरानी का अलाम और साजिद अगले एक महीना अस्पताल के कौमा में रहा यह सोचते हुए कि ऐसा क्या हुआ था कि मौत कि मंज़ूरी लेनी पड़ी ?

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Original Source: https://yourviews.mindstick.com/view/70570/maut-ki-manzoori

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