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title: "Writing is a great art"  
description: "Writing is not easy. Very few people are able to do it in a manner, so those who are able to do it also have a reputation. For example, Marathi writer Ranjit Desai used to create scenes of jungle etc. with words."  
author: "Gurmeet Kaur"  
published: 2019-10-22  
updated: 2019-10-23  
canonical: https://yourviews.mindstick.com/view/50530/writing-is-a-great-art  
category: "ideology"  
tags: ["writing", "writing is an art"]  
reading_time: 6 minutes  

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# Writing is a great art

लिखना आसान काम नहीं होता। बहुत कम लोग ढंग से कर पाते हैं, इसलिए जो कर पाते हैं उनकी ख्याति भी होती है।। उदाहरण के तौर पर देखें तो मराठी लेखक रणजीत देसाई शब्दों से ही जंगल इत्यादि के दृश्य रच देते थे। \
जहाँ आप कभी गए न हों, उनका लिखा पढ़ लें तो लगता उस जगह भी खुद खड़े हैं। प्रेमचंद को दो बैलों की कथा में पढ़ लीजिये तो किसान कैसा दिखता होगा और उसके दोनों बैल कैसे दिखते/बर्ताव करते थे ये सब आँखों के आगे आ जाता है।

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इनकी तुलना में मेरे जैसे किसी आदमी से पूछ लिया जाए कि रसगुल्ला कैसा होता है।, तो क्या लिखें?\
संभवतः कह देंगे कि मीठा होता है। फिर सवाल है। कि मीठा तो गुलाबजामुन भी होता है।, चोकलेट भी होते हैं, खीर-सेवइयां, हलवा, जलेबी, सभी मीठे ही होते हैं। तो क्या रसगुल्ला इन जैसा ही होता है ?\
कोई अच्छा लेखक लिखे तो शायद बिलग्रामी और डोडा बर्फी के स्वाद का अंतर भी बता दे। हम बस ये कह पायेंगे कि ये बिहार में मिलने वाली मिठाइयाँ हैं और बनती दोनों दूध से ही हैं! मूर्त के साथ अमूर्त का भी अनुभव करवा देना शब्दों की जादूगरी है।\
रूप-रंग जो दृश्य हैं, मीठा-खट्टा जो स्वाद हैं, ठण्ड, बरसात की बूंदों का शरीर पर पड़ना, भय-प्रेम जैसे अनुभव, जब ये पांच इन्द्रियों के जरिये महसूस किये जाने वाली चीज़ें कागज़ पर उकेरे अक्षरों से महसूस होने लगे तो कहा जा सकता है। कि अच्छा लिखा गया।

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लिखा प्रचार के लिए भी जाता है। जिस चीज़ का पता न हो, या सामने से जितना दिखे उससे कहीं लम्बी सी कहानी पीछे छुपी हो, तब तो लिखना जरूरी हो जाता है।। संगीत और ख़ास तौर पर भारतीय शास्त्रीय संगीत में इसी वजह से लिखना जरूरी हो जाता है।\
सिर्फ जो सुन रहे हों, रस उतना ही नहीं होता, उसके पीछे पूरा गणित-विज्ञान और परंपरा भी होती है। \
वो एक राग है।, जिसे किसी ख़ास समय ही गाया जाता है।, अब उसी समय क्यों इसकी जोड़-तोड़ होती है।। राग किसी थाट का है।, किसी ख़ास ताल पर बजेगा, राग की रागनियाँ हैं – परिवार है।,\
कोई ख़ास घराना उस राग के लिए जाना जाता हो, ऐसा भी हो सकता है। इसलिए घरानों की भी कहानियां हैं। ऐसी सभी कहानियों को खोने से बचाने के लिए लिखना पड़ता है।\
इससे जुड़ी समस्या ये है। कि लिखना विवाद भी पैदा कर देता है। भातखंडे जो रागों का वर्गीकरण लिखने के जाने जाते हैं, उनकी भी सारी बातें मान ली गयीं हों, ऐसा नहीं है। उनके वर्गीकरण पर भी विवाद चलता रहता है।

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फिर कोई नामी-गिरामी पद्मश्री संगीतज्ञ कहीं आपके लिखे पर सवाल उठा दे तो फजीहत भी बड़ी होगी, इसलिए संगीत पर लिखना हिम्मत का भी काम है।\

जहाँ तक संगीत को लिखने का सवाल है।, भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए ये परंपरा संभवतः वैदिक काल में जन्म ले चुकी होगी। वेदों में, विशेषकर सामवेद के गायन में उद्दात, अनुद्दात और स्वरित तीनों किस्म के स्वरों का इस्तेमाल होता है।\
जब वेदों को सुनकर, याद रखने की परंपरा से आगे बात बढ़ी होगी तो स्वर लिखे जाने लगे होंगे। जिस सरगम (सा, रे, गा...) को हमलोग आज संगीत लिखने के लिए इस्तेमाल करते हैं, उस शैली को भरत मुनि के नाट्य शास्त्र के समय ही एक स्थापित रूप में देखा जा सकता है।\
करीब दो सौ ईसा पूर्व से दो सौ ईसा पश्चात् के काल में नाट्य शास्त्र की रचना पूरी हो चुकी थी इसलिए इसे 2000 वर्षों से अधिक समय से “लगातार चली आ रही” परंपरा कहा जा सकता है।

## *नाट्य शास्त्र के अट्ठाईसवें अध्याय का इक्कीसवां श्लोक कहता है। –*

***तत्र स्वराः – षड्जश्च ऋषभश्चैव गान्धारो मध्यमस्तथा ।\
पञ्चमो धैवतश्चैव सप्तमोऽथ निषादवान् ॥ (नाट्यशास्त्र 28.21)***

षड्ज को छोटे रूप में सा, ऋषभ को रे, गान्धार को गा, मध्यम को म, पञ्चम को प, धैवत को ध, और निषाद को न लिखते हैं। सिर्फ इतने पर ही अगर उत्तर भारतीय संगीत परंपरा और दक्षिण भारतीय कर्णाटक वाले संगीत का अंतर देख लें तो जिस ऋषभ को उत्तर में “रे” लिखा जाता है। \
उसी को कर्नाटकी संगीत में “री” लिखते हैं। संभवतः दक्षिण भारतीय लोग, उत्तर की तुलना में ज्यादा शुद्धतावादी हैं। अगर पहले अक्षर से लिया जाए तो ऋषभ को “रे” लिखने से बेहतर होगा “री” लिखना। \
लेकिन फिर सवाल उठेगा कि ऐसे तो षड्ज को भी “सा” नहीं, “ष” लिखना चाहिए! और इस तरह संगीत को लिखने में विवाद फिर से छिड़ जायेगा। \
संगीत “को” लिखने में जो मुश्किलें हैं वो तो हैं ही, संगीत लिखने और संगीत “पर” लिखने में उससे थोड़ी अलग समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। संगीत पर लिखने से किसी विधा, वाद्ययंत्र या शैली जैसी ही चीज़ों की बात हो ऐसा जरूरी नहीं।

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संगीत लिखने की बात हो तो बंगाली टप्पा याद आता है।, जिसका नाम तो बंगाली टप्पा है।, मगर उसकी रचना बिहार में हुई थी। रामनिधि गुप्ता उर्फ़ निधु बाबु छपरा में नौकरी करते थे और वहीँ उन्होंने शराब पीकर “टप्पा” लिखना शुरू किया था। \
बाद में वो कोलकाता लौट गए जहाँ लोगों ने टप्पा गाना शुरू कर दिया। आजकल “बिहार में बहार है।” और उस वजह से भी “बुद्धिजीवी” अपने निधु बाबु की ही तरह पलायन करके नॉन रेजिडेंशियल बिहारी हो गए हैं। \
हो सकता है। इस कारण भी बिहार में आजकल न तो संगीत लिखा जा रहा है।, न संगीत पर लिखा जा रहा है।\
जंगलराज आने के दौर से पहले तक पटना भी शास्त्रीय संगीत के लिए जाना जाता था। दुर्गा पूजा के पंडालों के साथ ही शास्त्रीय संगीत का भी आयोजन होता था और जाने-माने सभी दिग्गज यहाँ प्रस्तुति देने आया करते थे। \
इसकी तुलना में आठ साल पहले जब किशोरी ओमनकर पटना के गांधी मैदान आयी थी तब कुछ असामाजिक तत्वों के कारण कारण उन्हें स्टेज छोडना पड़ा था। संगीत से जुड़ी ज्यादातर जानकारी जो आती है।, वो सोशल मीडिया के जरिये ही आती है।\
इसमें भी जिस बिहारी का योगदान है। (डॉ. प्रवीण झा) वो “बिहार में बहार” आने से काफी पहले ही नॉन रेजिडेंशियल बिहारी हो गए हैं। शिक्षा या संस्कृति से जुड़े किसी सरकारी महकमे से ऐसे लोगों को कोई प्रोत्साहन मिलता हो तो याद नहीं आता। \
हाँ बिहार के जिस आखरी संस्कृति मंत्री की याद आती है। वो द्विआर्थी भोजपुरी गीत जरूर लिखा करते थे।\
![Writing is a great art](https://yourviews.mindstick.com/viewsolution/9bcb671e-707d-445c-9c44-16d20d7e6828/images/256b5908-548c-429e-a6ea-cf0784e7accd.jpeg)\
बाकी दूसरे कई क्षेत्रों की तरह ही, इस क्षेत्र में भी “जुगाड़” का अपना महत्व है। उत्तर प्रदेश और बिहार में सत्तर के दशक में जो संगीत महाविद्यालय खुलने की योजना, पंचवर्षीय योजना में डाली गयी थी वो पचास साल में भी खुल नहीं पाया है।\
मेरे ख़याल से (संगीत वाला नहीं, सोच वाला) जुगाडू लोगों को संगीत को और संगीत पर लिखने के क्षेत्र में उतरना ही चाहिए!\
**\
[वैचारिक साझेदारी !!]**

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