---
title: "Foreign invader and our historical analysis"  
description: "All over the world, we are the only people who can decorate the stigma of slavery. You do not have to wander much in search of the proof of this statement of mine, because the evidence of this runs almost simultaneously with you and us."  
author: "Shrikant Mishra"  
published: 2019-09-23  
canonical: https://yourviews.mindstick.com/view/40523/foreign-invader-and-our-historical-analysis  
category: "indian history"  
tags: ["history", "indian history"]  
reading_time: 5 minutes  

---

# Foreign invader and our historical analysis

**हमारी बौद्धिक गुलामी\
([Foreign](https://yourviews.mindstick.com/story/2164/here-are-the-best-foreign-universities-for-higher-education) invader and our intellectual slavery)\
\**

पूरी दुनिया में गुलामी के कलंक को टीका बनाकर सजाने वाले केवल हमलोग ही हैं । मेरे इस कथन के प्रमाण की तलाश में आपको ज्यादा भटकने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसके प्रमाण आपके और हमारे लगभग साथ- साथ चलते हैं।

आप अपने शहर, गाँव या मोहल्ले का नाम देखिये जो भारतीय संस्कृति से निःसृत नहीं है और जिसे देखकर किसी को कोई पीड़ा नहीं होती। आप अपने आसपास आक्रांताओं को पूजते लोगों को देखिये,

आप अपने आस-पास उन इमारतों पर गर्व से सेल्फ़ी खिंचवाते लोगों को देखिये, जिन्हें आपके स्वाभिमान का मर्दन करके खड़ा किया है, आप अपने पाठ्यक्रमों में शामिल पुस्तकों को देखिये जो आक्रांताओं का महिमागान करते हैं और आप गर्व से उसे पढ़ते हैं।

आप अपने देश में बन रहे चलचित्र, धारावाहिक और नाटकों को देखिये कि कैसे आपकी अस्मिताओं को रौंदा जा रहा है और आप देखिये अपने आसपास खड़े उन लोगों को,

जिन्हें गुलामी करने और हमें गुलाम बनाकर रखने वाले की भक्ति में असीम आनंद आता है; आपको पता चल जायेगा कि आखिर क्यों मैंने ये कहा कि पूरी दुनिया में गुलामी के कलंक को टीका बनाकर सजाने वाले केवल हमलोग ही हैं।

बिहार का शहर नालंदा का अपना गौरवशाली अतीत है। तक्षशिला के बाद तब के विश्व के दूसरे सबसे बड़े और प्राचीन विश्विद्यालय का शहर है नालंदा ; जहाँ के विश्वविद्यालय में दुनिया के कोने-कोने से छात्र पढ़ने आते थे

और जहाँ का कुशल प्रबंधन आज भी दुनिया के कई विश्विद्यालयों के लिये चकित कर देने वाला और अनुकरणीय है।

महापराक्रमी गुप्त शासक कुमारगुप्त ने पांचवीं शताब्दी में इस विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया था और गुप्त शासन के बाद इसे हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला था।

नौवीं शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी यानि लगभग तीन सौ वर्षों तक इस विश्वविद्यालय की ख्याति पूरे दुनिया में थी जो बिलकुल गैर-मामूली बात है। सातवीं सदी में जब ह्वेनसांग भारत-भ्रमण पर आया था, उस समय उस विद्यालय में दस हज़ार छात्र और करीब पन्द्रह सौ आचार्य थे

और इस विद्यालय के छात्रों में सुदूर पूर्व और दक्षिण एशिया से लेकर मध्य-पूर्व तक के छात्र शामिल थे।

करुणा के अवतार भगवान बुद्ध का पदार्पण कई बार नालंदा में हुआ था और वहाँ की मंडलियों में कई बार उनके ज्ञान की सरिता प्रवाहित हुई थी। इसी नालंदा शहर में भगवान बुद्ध का प्रिय शिष्य सारिपुत्त धम्म में शामिल हुआ था।

इसी नालंदा के शहर पावापुरी में भगवान महावीर का अग्नि-संस्कार हुआ था।

खैर, दुर्भाग्य कि नालंदा के इस महान शिक्षा केन्द्र पर एक बर्बर आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ११९९ में हमलावर हुआ और उसे इसे जलाकर नष्ट कर दिया. लगभग सात सौ सालों तक विश्व को ज्ञान की ज्योति से आलोकित करने वाला ये मंदिर तीन महीनों में धू-धू कर जल गया।

तीन महीना इस लिये क्योंकि इस विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में इतनी किताबें थी कि उसे पूरी तरह जलने में महीनों का समय लगा।

वो नीच खिलजी सिर्फ यहाँ आग लगाकर ही नहीं रुका, बल्कि उसने वहाँ के एक शहर का नाम भी अपने नाम पर बख्तियारपुर रख दिया और जब लौटा तो वहीं दफन भी हुआ।

आज उस आक्रांता के नाम पर बिहार का एक रेलवे स्टेशन सुशोभित है और हम गैरतहीन लोगों ने उसके दिये नाम को स्वीकार भी कर लिया है और वो भी इस हद तक कि इस कलंक को मिटाने का ख्याल तक हमारे जेहन में नहीं आता।

बख्तियार खिलजी के नाम पर बने उस स्टेशन से न जाने कितने हज़ार लोग रोज़ गुजरते हैं, मगर किसी के जेहन में इसे लेकर शर्मिंदगी नहीं महसूस होती। किसी की भी आँखें इसे देखकर शर्म से नहीं झुकती।

किसी की भी अंतरात्मा उसे इस बात के लिए नहीं कचोटती कि हमारे डीएनए में घुल चुका धिम्मीपन अब हट जाना चाहिए।

आचार्य शीलभद्र और आर्यभट्ट ने कभी उस गौरवशाली विश्वविद्यालय के कुलपति पद को शोभित किया था, क्या बख्तियारपुर स्टेशन का नामकरण उनके नाम पर नहीं हो सकता?

प्रश्न हम सबसे था कि बख्तियारपुर स्टेशन के नाम का शुद्धिकरण अभियान चलाकर हम अपने पापों का प्रायश्चित करेंगे या फिर क्लीव बनकर आनेवाली पीढ़ी के सामने उपहास का पात्र बनेंगे?

मगर बीड़ा उठाया गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री पूज्य स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती जी ने, जिन्होंने आज बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी, माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, रेल मंत्री जी और गृह मंत्री जी को एक पत्र लिखकर बख्तियारपुर स्टेशन का नाम बदलने की माँग की है।

अब बड़ी जिम्मेदारी बिहारियों पर भी है, क्योंकि महान नालंदा विश्वविद्यालय की संतति होने के नाते इस पाप के परिमार्जन की पहली जिम्मेदारी हमारी थी, मगर हम चूक गये।

अभी कुछ दिन पहले 25 अगस्त को ऋषिकेश में हुये एक कार्यक्रम में जो प्रस्ताव पारित किये गये थे, उनमें एक ये भी था कि गुलामी के सारे चिन्हों को हटाया जाये और जिसमें पहला नाम बख्तियारपुर स्टेशन का था।

स्वामी जी(बाबा रामदेव) का अभिनंदन है कि उन्होंने उस प्रस्ताव को साकार करने में सबसे पहला कदम उठाया है।

---

Original Source: https://yourviews.mindstick.com/view/40523/foreign-invader-and-our-historical-analysis

Copyright © MindStick Software Pvt. Ltd. This Markdown version is provided for developers, AI systems, and offline reading.
