False Furore Over The Leadership Definition Statement Of Army Chief Bipin Rawat
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27-Dec-2019, Updated on 12/27/2019 4:23:12 AM

False Furore Over The Leadership Definition Statement Of Army Chief Bipin Rawat

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सेना प्रमुख बिपिन रावत के बयान पर हो रहा कोहराम है बेफ़र्ज़ी

संसद से पास हो चुके नागरिकता संशोधन अधिनियम कानून को लेकर देश भर में अभी भी कहीं न कहीं विरोध प्रदर्शन अभी भी चल रहा है. अब इसको लेकर कल एक कार्यक्रम में अक्सर विपक्ष के निशाने पर रहने वाले थलसेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने जामिया मिलिया इस्लामिया जैसी यूनिवर्सिटीज में होने वाले हिंसक और राजनीतिक तौर पर प्रायोजित कट्टर मुस्लिम छात्रों के हिंसक प्रदर्शन पर अपने विवेकशील और बेबाक शब्द क्या बोले, लिबरल-लेफ्ट लॉबी अथवा टुकड़े-टुकड़े गैंग के नाम से मशहूर यह राष्ट्र-विरोधी ग्रुप उनको अपने टारगेट राडार पर लेने के लिए उतावला हो गया.

पहले तो यह जानना हर भारतीय नागरिक के लिए ज़रूरी है कि जनरल विपिन रावत जो 31 दिसंबर को रिटायर हो रहे है, उन्होंने इस मसले पर आखिर कहा क्या था ? उन्होंने शहर और कस्बों में नागरिकता संशोधन अधिनियम को बिना ीक से जाने पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाने वाले इन हिंसक प्रदर्शनों के नेतृत्व पर कटाक्ष करते हुए "असली नेतृत्व" की परिभाषा को रेखांकित किया. 

असली लीडरशिप यानी नृतत्व क्या होता है यही तो बिपिन रावत ने बताया है. आखिर नैतिकता से परे स्वार्थ के दोष के परिपूर्ण जो नृतत्व किसी अपराध के मकसद के तहत गलत दिशा दिखाए वह आखिर गलत नेतृत्व ही तो हुआ न ? लेकिन इसका बड़ा ही घटिया तोड़ लेफ्टिस्ट लोगों ने निकाल लिया है.  

पहले तो कांग्रेस के कुख्यात प्रवक्ता बृजेश कलप्पा एक साजिश की बू लेकर सामने आए और जनरल बिपिन रावत की बतौर नागरिक बोलने की स्वंतंत्र पर आघात करते हुए बेतुका ट्वीट कर डाला है ऐसे ही आर्मी प्रमुख आज नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ बोल रहे है जो संविधान के खिलाफ है और उन्हें रोका नहीं गया तो वह तख्तापलट के लिए कूच कर जायेंगे ! वाह ! क्या थ्योरी दी है जनाब ने जिनका कुतर्क तो अच्छे-अच्छे ज्ञानियों के छक्के छुड़ा दे. 

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फिर आ गए लंदन के बैरिस्टर कम देश को निज़ाम-ए-मुस्तफा में तब्दील करने वाले असदुद्दीन ओवैसी जिनके लिए बस आधे सच को पेश कर बकवास करना ही अब एक मात्र काम रह चुका है. उन्होंने तो अपना ही घटिया तर्जुमा पेश करते हुए कह डाला कि लीडरशिप का मतलब होता है कि खुद के ऑफिस यानी पद की सीमाओं को समझना. 

महाशय शायद भूल गए कि वह खुद एक चुने हुए सांसद है और देश के प्रधानमंत्री को सीधे नाम से बुलाते हुए अपनी पद की गरिमा को भी तोड़ देते है और सीमा भी पार कर जाते है. 

खैर विपिन रावत को इन आधा सच बोलने वाले कुतर्कियों और मुनाफिकों से घबराने की कोई ज़रुरत ही नहीं है क्योंकि वह देश के लिए जीते है और एक राष्ट्रप्रेमी भारतीय नागरिक को उन पर गर्व है. 

लेफ्ट वाले अपनी चल चलते रहेंगे और राइट विंग वाले उनको एक्सपोज़ करते रहेंगे लेकिन इस पूरे प्रकरण का निष्कर्ष केवल इतना है कि सेना प्रमुख बिपिन रावत के बयान पर जो कोहराम हो रहा, वह बेफ़र्ज़ी ही है, नोट कर लीजिये.

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